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याँदों की सिलवटें ~ रश्मि और शोभा

  • टी रजनीश
  • May 23, 2023
  • 9 min read

रश्मि चली गई और साथ ही गई घर की रौशनी, घर की ख़ुशी । तीन महीने बारह दिन और कुछ ही घंटे , रश्मि मनोहर लाल जी की बहू बनकर इस घर में रही ! जाते समय उसके पैर जैसे उठ नहीं रहे थे, नज़रें झुकी हुई थी~ बस किसी तरह वो ख़ुद को इस घर से बाहर ढकेल रही थी ! गड़ी आँखो से घर के दीवारों के सहारे बनी हुई सफ़ेद अधमिटे से रंगोली डिज़ायन जैसे मुहँ चिढ़ा रहे थे । हालाँकि वह बस चंद महीने पहले ही इस नई जिन्दगी में आई थी, तब भी यही हाल था झुकी नज़र दबे क़दमों की चाल ~ पर वो एक नवेली दुल्हन के अंदाज़ थे पर अभी उसकी रूखसती उसके पूर्व की एक ग़लती का भयानक परिणाम था , जो उससे उसकी जिन्दगी छीन ले रहा था~भविष्य पर कालिख पोत गया था ।


छत पर खड़ा आनंद बदलती जिन्दगी को मायूसी से सरकते देख रहा था, ~ अनायास उसकी नज़र दरवाज़े पर बँधे तोरण से टूटकर गिरते हुए आम के पल्लो पर चली गई जो कल तक शुभ था, सुन्दर था, आज निर्जीव पत्ते की तरह अलग थलग गिरा पड़ा था, कूड़े के ढेर में समा कर हमेशा के लिए गुम हो जाने के लिए । टेम्पो के दरवाज़े से जाते ही ,दरवाज़ा बंद कर सब लोग अंदर लौटे एक भयानक सन्नाटा लिए , जिसमें सिर्फ प्रश्न था अनगिनत प्रश्न एक दूसरे के लिए ~ भगवान के लिए ! आनंद ने छत पर पानी की टंकी के पीछे छुपा कर रखी सिगरेट निकाल कर जलाई और लंबी कश लगा कर वही ज़मीन पर बैठ गया रेलिंग के सहारे ! धुएँ के छल्ले बेरहमी से मुँह चिढ़ा कर उससे दो चार होते रहे , वो भी अनमने से एक सरेंडर सिपाही की तरह, कश पर कश लगाता रहा ।


शाम ढल गई तो मनोहर लाल जी ने नीचे से आवाज़ लगाई ~ आनंद बेटा चाय पी लो, ~ सुनकर भी अनसुना किए बैठा रहा आनंद । कई बार आवाज़ देने के बाद भी जब वो नीचे नहीं गया तो उसकी बड़ी बहन दिव्या छत पर आकर उसे उठाकर नीचे ले गई । आनंद वैसे भी मृदुभाषी है, पर इस घटना से वो एकदम छुप था,लोग उससे नज़रें बचा रहे थे और वो लोगों को नज़रअंदाज़ कर रहा था । मनोहर लाल जी उनकी पत्नी मीरा और आनंद के बीच आजकल संवाद की बस एक ही कड़ी थी, आनंद की बड़ी बहन दिव्या , जो उससे तीन चार साल बड़ी थी और दो बच्चों सहित उसका भरा पूरा परिवार था, वो अपने पति के साथ नासिक में रहती थी जहाँ उसका पति एक ऊँचे ओहदे पर सरकारी मुलाजिम था ।


इस एक घटना ने आनंद की जिन्दगी बदल सी दी थी, स्वाभाविक भी था । पहले से ही अंतर्मुखी आनंद ने अब ख़ुद को अपने में ही समेट कर रख लिया था । कोर्ट कचहरी फ़ाइल और संवेदनहीन काग़ज़ात उसके दिनचर्या के अभिन्न अंग हो गए थे । नाते रिश्तेदार पर्व त्योहार से उसने ख़ुद को काट लिया था । कम बोलना और अकेले रहना अब उसकी आदत में शुमार हो गया था । फ़ैमिली कोर्ट हर पन्द्रह दिनों में एक तारिख ज़रूर लगाता था । नियत दिन पर आनंद अपने पिताजी के साथ फाइलों का बंडल लिए पहले वक़ील के कुर्सी के पास , फिर पेशकार के पास सुनवाई का समय पूछने पहुँच जाता । फिर बिजली के खंभे से सटे बेंच पर इंतज़ार होता, सुनवाई का । आते जाते लोग जवान और बूढ़े अपने अपने मसाइलों के लिए उलझते, बकझक करते , क़िस्मत को कोसते, वक़ील से मशवरा करते और शाम ढलने पर अपनी अपनी राह चलते ! आनंद ने किसी को भी मुकदमा जीत कर मुस्कुराते नहीं देखा था । उसका निष्कर्ष था ~ कोर्ट की जीत आज तक कभी किसी को ख़ुशी नहीं दे पाई । जज साहब बैठे नहीं , लिहाज़ा मनोहर लालजी और आनंद घर के तरफ़ चल पड़े । किसी फ़िल्म का डायलाग डेट पर डेट अब सही मायने में आनंद और उसके परिवार को समझ आने लगा था । एक दिन फ़ोन बजा तो आनंद ने अनमने से उठाया तो देखा कॉल रश्मि का था, ना जाने क्यों उसने फ़ोन उठा लिया ~ हलो ~~ उधर से थोड़ी ख़ामोशी के बाद पूछा गया ~ कैसे हो ? ठीक हूँ , > कह कर औपचारिकता पूरी की उसने ! फिर रश्मि ने कहा आज डेट है, मैं भी आ रही हूँ मिलना चाहती हूँ ! आनंद ने फ़ोन काट दिया, गए डेढ़ साल में दो तीन बार रश्मि ने बात करने की कोशिश की थी पर आनंद ने ही बढ़ावा नहीं दिया था, क्या कहता भी वो , क़ानून और माँ बाप के ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत नहीं थी उसकी ! उस दिन जो कचहरी में हुआ वो अप्रत्याशित था, पहले दोनों ने एक दूसरे को अलग अलग तरीके से दूर से ही देखा और जब कोर्ट लगा तो रश्मि दौड़ कर आनंद से लिपट गई~~ मुझे माफ़ कर दो ~ कहते हुए उसके आँसूओं की धार निरंतर बही जा रही थी । आनंद ने ख़ुद को संभालते हुए किसी तरह अलग किया , फिर भी वो पैरों पर गिरकर माफ़ी की दुहाई माँगती रही । भोला था , आनंद का मन ~ लगभग पसीज ही गया था की मनोहरलाल जी ने बीच बचाव कर स्थिति को संभाला । इस हल्ला गुल्ला के बीच अगली डेट पड़ गई ।


इस डेट के खेल ने काफ़ी समय ले लिया , एक लंबा अरसा आनंद और उसके परिवार के हाथ से बेमानी होकर फिसल गया । महीनों सालों बीत गए कचहरी के चक्कर में , लगभग छ: साल का अरसा बीत गया । इस बीच वक़ील बदला, जज बदला, लोगों का ज़मीर बदला, रश्मि के पिता ने कई दाँव पेंच और तिकड़मों का सहरा लिया, पर क़ानून बंद आँखो से सब देखता रहा , बिना किसी संवेदना व प्रतिक्रिया के ।


आनंद की कई नौकरी गई , मनोहरलाल जी रिटायर हो गए , मीरा जी जो पहले कम बोलती थी अब सिर्फ हूँ हाँ या इशारे की भाषा पर सिमट गई, शुगर इतना बढ़ गया की इन्सुलिन का सहारा लेना पड़ा ~ कुल मिलाकर सब अस्त व्यस्त हो गया । मनोहरलाल जी का परिवार कोर्ट के तारीख़ों में गिरवी हो गया ।


अरे मनोहर जी , पीछे से किसी ने आवाज़ दी , जब वो सब्ज़ी का थैला स्कूटर में फँसा रहे थे । मुड़कर देखा तो चौबे जी थे पुराने परिचित और बगलगीर , पास आकर अभिवादन किया और कौतूहल भरे आश्चर्य से बोले ~ ये क्या हाल कर रखा है ? सब कुशल है ना ? हाँ सब ठीक है ~ फीकी मुस्कान से कहा मनोहर जी ने ! पर पुराने मित्र ने क्षण में ताड़ लिया सदा हँसमुख मिलनसार सबके मन को हरनेवाला , सबको अपना बनाने वाला या सबका हो जाने वाला मनोहरलाल किसी विशेष परिस्थिति से गुज़र रहा है । अच्छा चलो , शाम को मिलता हूँ, फिर बैठ कर बातें करेंगे , कहकर चौबेजी ने स्कूटर आगे बढ़ा दिया । शाम को बड़ी बेचैनी से मनोहरलाल इंतज़ार कर रहे थे अपने मित्र का जो रिटायरमेंट के बाद बेटे के पास दिल्ली चले गए थे । उन्हे बहुत इंतज़ार नही करना पड़ा , चौबे जी भी उत्सुक थे मिलने के लिए और मित्र से दुख सुख बाँटने के लिए ।


अरे भाई कोई है~~ के चीरपरिचीत अंदाज़ में आवाज़ लगाते हुए चौबेजी जब ग्रिल का कुंडा खोल दाख़िल हुए तो मनोहरलाल जी बाल सुलभ चपलता से स्वागत करते बोल उठे ~ आइए भाई सब कोई यहीं है ।


भाभीजी नमस्कार कहते हुए चौबेजी बालकनी में लगे कुर्सी पर आसन हुए । मीराजी ने भी अभिवादन किया और चाय लाने को कहकर अंदर की ओर चल पड़ी । सालों बाद आज बालकनी में बैठक हो रही थी, मित्रों की गिले शिकवे, सलाह मशवरे का दौर चलता रहा ,चाय की चुस्कियों के साथ । कुछ देर बाद मनोहरलाल जी की कालोनी फ़ेमस ठहाकेदार हँसी सुनाई पड़ी तो आनंद कौतूहलवश बाहर आ गया, नमस्कार की औपचारिकता के बाद पुनः अपने कमरे में लौट गया । चौबेजी को विदा कर मनोहरलाल जी जब घर के अंदर लौटे तो काफ़ी आश्वस्त से लग रहे थे जैसे सीने से कोई बड़ा बोझ कम हो गया था,आख़िर मित्र से देर तक बातचीत जो हुई थी ।


अगली सुबह नौ बजे तक तैयार होकर मनोहरलाल जी ने आनंद को आवाज़ दी ,आनंद जी तैयार हैं क्या ? बस अभी आया ~~ बंद कमरे से जवाब मिला । आनंद ज्यों ही बाहर आया पिता ने फ़रमान सुना डाला ~ भाई काग़ज़ वग़ैरह ले लो जज साहब से मिलने जाना है । जज साहब से ? आश्चर्य के साथ पूछा आनंद ने ! हाँ चौबेजी के परिचित है, समय माँगा है मैंने , मिलकर केस के बारे में बताने के लिए । नियत समय पर दोनों पिता पुत्र जज के चेंबर में बैठे थे । थोड़ी देर के बातचीत के बाद जज साहब को सब समझ आ गया था, उन्होंने पिता पुत्र को आश्वस्त कर त्वरित फ़ैसले का आश्वासन दिया । सात दिन बाद अगली तारिख थी । उस दिन केस के फ़ैसले की तारिख तय कर दी गई २५ मार्च । इस बीच मनोहरलाल जी को , जो की एक प्रमुख शिक्षा विद्ध एवं समाजसेवी थे उन्हें किसी सम्मेलन के लिए चेन्नई जाना पड़ा । लौटने की तारिख २६ मार्च थी अत: ये तय हो गया फ़ैसले के दिन वो उपस्थित नहीं रहेंगे । भारी मन से आनंद को ढेरों हिदायतों के साथ मनोहरलाल जी सफ़र पर रवाना हुए ।


फ़ैसले के नियत दिन आनंद समय से पूजा अर्चना करके माँ का आशीर्वाद लेकर कोर्ट में उपस्थित था, जैसा की अपेक्षित था फ़ैसला आनंद के हक़ में सुनाया गया । फ़ैसले के समय रश्मि या उसके परिवार से कोई मौजूद नहीं था । जज साहब ने कहा की चूकीं रश्मि की शादी पूर्व में कोर्ट मैरिज के रूप में मनोज यादव के साथ हो चुकी है अत: रश्मि क़ानूनन मनोज की पत्नी है और उसकी दूसरी शादी आनंद के साथ वैध नहीं है । अत: आनंद को इस शादी से मुक्त किया जाता है । अतीत कैसे भविष्य पर भारी था ये आनंद को साफ़ दिख रहा था । मनोहरलाल जी को फ़ोन पर ख़बर मिली , तो वो भी आश्वस्त हुए और कलकत्ता में अपने मौसेरे भाई से मिलने के लिए रूक गए ।

मीरा जी ने भगवान के दर्शन किए, बेटी दिव्या से बात की और ख़बर बताया ।


रात बीती और सुबह हुई , आज ज़माने बाद आनंद छत पर टहल कर सिगरेट के कश लगा रहा था, उसे अंधेरी सुरंग के आगे रौशनी की किरण दिख रही थी ~ तभी मोबाईल की घंटी ने उसे चौका दिया । फ़ोन कलकत्ता से अजीत अंकल का था , मन ही मन उसने सोचा ~ पापा रात को वही रूके थे , हलो अंकल ~ नमस्ते , हाँ बेटा ~~एक ज़रूरी बात करनी है , कह कर जो उन्होंने कही ~ आनंद वही बैठ गया । मनोहरलाल जी अब नहीं रहे । एक मुसीबत से बाहर निकला नही की एक और आघात ~ नियति उसके साथ क्रूर मज़ाक़ कर रही थी ~ आनंद लगातार नाख़ून काटते हुए सोचता जा रहा था । दिव्या उसके पति और आनंद ने इस विपरीत परिस्थिति में मोर्चा संभाल लिया । मनोहरलाल जी के पार्थिव शरीर को अतिंम दर्शन के लिए घर लाया गया ~ शांत चित् चीर निद्रा में लीन मनोहरलाल जी के चेहरे पर एक संतोष था , जो आनंद दिव्या और मीरा जी को स्पष्ट दिख रहा था , बिना छानबीन किए विवाह में अपने बेटे के जिन्दगी में आई उतार चढ़ाव के दर्द को अपने सीने में दफ़्न कर स्वयं को को भी मुक्त कर लिया था उन्होंने । मानवीय मूल्यों का निर्वाह कर किसी पर भरोसा किया था और धोखा खाया था पर संस्कार ऐसे की, बदले की बात नहीं सोची ~ माफ़ कर दिया था मनोहरलाल जी ने , और हमेशा के लिए इहलोक त्याग दिया था । हिन्दू परम्परा ,विधी विधान धाव भरने में बहुत मदद करते हैं , १३ दिन की परम्परागत शोक में काफ़ी कुछ सँभल गया , दिव्या ने बड़ी बहन का रोल बख़ूबी निभाया, मीराजी तो जैसे सूनी आँखो से हमेशा दिव्या को ही पुकारती रहती थी ।


एक सुबह मनोहरलाल जी के फ़ोन की घंटी बजी ~ कोई सज्जन अपनी बहन के रिश्ते की बात कर रहे थे आनंद के लिए , अजीब इत्तेफाक था फ़ोन दिव्या ने उठाया था । ख़ुद को संभाल कर बात आगे बढ़ाई तो पता चला मनोहरलाल जी ने किसी के मार्फ़त बात चलाई थी , दिव्या ने थोड़ा समय माँग कर दोबारा फ़ोन करने के आश्वासन के साथ फ़ोन रख दिया । भगवान् एक रास्ता बंद करता है तो एक रास्ता खोल देता है , बस यही सोच कर दिव्या ने इस नए रिश्ते को जोड़ने की ठान ली । मीरा जी तो बस समय के संदर्भ में वैध्व्य को धारण कर इच्छा मुक्त हो गई थी, अत: उन्हें मनाने में दिक़्क़त नहीं हुई, पर आनंद इस समय इतनी जल्दी कुछ भी करने को तैयार नहीं था, दिव्या भी दृढ़ निश्चयी महिला थी , साम दाम दंड भेद सब जतन कर उसने आनंद को तैयार कर ही लिया , हालाँकि इसमें उसे अपने पति का भी विरोध झेलना पड़ा । बात आगे बढ़ी , तारिख तय हुई, एक और डेट मिला पर इस डेट से डर नहीं रहा था कोई । धनिष्ट मित्रों व परिवारजनों के बीच गायत्री मंदिर में वैदिक रीति से आनंद और शोभा का पाणिग्रहण संपन्न हुआ, तुरंत बाद प्रीति भोज में सबने वर वधू के सुखमय जीवन की कामना की । और इस तरह शोभा आ गई , स्वर्गीय मनोहरलाल जी की पुत्र वधू बनकर !


समय चक्र चलता रहा अनवरत, साल के अंदर आनंद को लक्ष्मी की प्राप्ति हुई , पूरे घर में किलकारियाँ गूँजने लगी, दिव्या भी बुआ बन इठलाती फिरें, मीरा जी भी होंठ दबा कर यदा कदा मुस्करा देती । आनंद और शोभा ने मिलकर कुछ शिक्षण का व्यवसाय कर लिया था , जो ठीक ठाक चल रहा था । घर को भी रंग रोशन कर नया लुक दिया गया था, काई के पुराने निशान घिस कर हटा दिए गए थे । मनोहरलाल जी चीरपरिचीत अंदाज़ में अपनी तस्वीर की जगह से ही मुस्करा रहे थे ~ शोभा आ गई है~ घर की सुन्दरता ले आई है साथ लाई है नियति का विधान~ विधी ~ नन्ही कली जिससे सारा घर गुलज़ार है ।

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